Wednesday, December 2, 2020

भाजपा में लामबंद हो रहे हैं असंतुष्ट, बैठकों के दौर से आला नेता बेचैन

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शिवकुमार विवेक की टिप्पणी

कड़ा अनुशासन और नैतिकता की बातें अब भारतीय जनता पार्टी में पुरानी गौरव गाथाएं बनती दिख रही हैं। पार्टी की मध्यप्रदेश इकाई में कांग्रेसियों के थोकबंद प्रवेश ने असंतोष का उबाल पैदा कर दिया है। प्रदेश भर के उपेक्षित कार्यकर्ता डंके की चोट पर बैठकें आयोजित कर रहे हैं। इस सिलसिले में ९ अगस्त को दूसरी बैठक बुलाने के ऐलान ने पार्टी के सयानों के कान खड़े कर दिए हैं।

वैसे भारतीय जनता पार्टी में दूसरे दलों के नेताओं को शामिल करने का सिलसिला अमित शाह के अध्यक्ष बनने के साथ ही तेज हो गया था। पार्टी के बदले हुए अंदाज के कारण इसे नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की नई भाजपा कहा जाने लगा। लेकिन मध्यप्रदेश में इस नई भाजपा का विद्रूप चेहरा डरा रहा है। पुराने जनसंघ के इस गढ़ में हाल में कांग्रेस से आए २७ विधायकों और ज्योतिरादित्य सिंधिया के सैकड़ों समर्थकों को हथेली पर रखकर लाने की घटना ने पुराने तपस्वी कार्यकर्ताओं को विचलित कर दिया है।

ज्योतिरादित्य के समर्थक विधायकों को मलाईदार मंत्रालय मिलने के बाद अब यह गुट भाजपा की राज्य कार्यकारिणी में भी वाजिब हिस्सेदारी मांग रहा है। ऐसे में, ज़ाहिर है कि पुराने नेताओं का ही पत्ता कटेगा। अपनी बुरी हालत होने के आसार देखकर वे खुलकर सामने आने से क़तरा रहे हैं। ऐसे ही एक पूर्व मंत्री दीपक जोशी, जो पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र है, ने हाईकमान को पहले तो तेवर दिखाए, बाद में वे अंसतुष्टों ( बुरा लगे तो ये लोग अपने को ‘उपेक्षितों’ कह सकते हैं) की हाल में भोपाल में हुई बैठक में सम्मिलित हो गए। उनके अलावा पूर्व राज्यसभा सदस्य रघुनंदन शर्मा, ग्वालियर से पूर्व मंत्री व स्व. अटलबिहारी वाजपेयी के भतीजे अनूप मिश्रा जैसे नेता भी इस बैठक का हिस्सा थे। बैठक रघुनंदन शर्मा ने बुलाई थी।

भाजपा के इन नेताओं के साथ ही निचले स्तर के कार्यकर्ता कांग्रेसियों के गले में हार डालने को ठीक नहीं मानते। पिछले कुछ सालों में ऐसे नवांगतुकों के कारण वे घर बैठते जा रहे हैं। यही नहीं, लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी स्पष्टत: और अभूतपूर्व ढंग से दो फांकों में बंटी नजर आने लगी है। धीरे-धीरे खाँटी कार्यकर्ता का घर बैठना और गुटों में विभाजित होना भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है क्योंकि कैडर आधारित दल होने के कारण भाजपा की शक्ति का आधार यही कार्यकर्ता और सांगठनिक अनुशासन रहे हैं। यही वजह है कि विधानसभा के आने वाले २७ उपचुनाव में केसरिया कांग्रेसियों को टिकट देने से भाजपा के कार्यकर्ताओं मे मौन साध लिया है। लिहाज़ा पार्टी की उत्साहकारी विजय की राह में रोड़े दिख रहे हैं।

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