Monday, November 30, 2020

क्या 2022 में बदल जाएगी उत्तराखंड सरकार? इन सवालों में छिपा है इसका जवाब!

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राजनीतिक संवाददाता

देहरादून। उत्तराखंड में करीब डेढ़ साल के बाद चुनाव होना है। अभी तक परंपरा रही है कि हर चुनाव के बाद सरकार बदल जाती हैं। क्या 2022 में भी ऐसा होने जा रहा है? इस सवाल का जवाब कुछ अन्य सवालों के जवाब में ही छुपा है। क्या पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की लोकप्रियता मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से कम थी? क्या उन्हें पार्टी विधायकों या अन्य जमीनी नेताओं का समर्थन हासिल नहीं था? इन दोनों ही सवालों का जवाब यही है कि हरीश रावत किसी भी स्थिति में त्रिवेंद्र से कम नहीं थे। बल्कि पार्टी विधायकों की बगावत के बावजूद उन्होंने जिस तरह से अपनी सरकार का दोबारा स्थापित किया वह न केवल उनकी राजनीतिक कुशलता का परिचायक था, बल्कि इससे यह भी दिखा था कि उनके नेतृत्व में पार्टी के नेताओं को भरोसा है। आज देखा जाए तो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वाले सतपाल महाराज को छोड़कर बाकी सभी नेता गुमनाम से हैं। मंत्री होने के बावजूद हरक सिंह रावत बेहद कमजोर हो गए हैं। राजनीतिक तौर पर विजय बहुगुणा क्या करते हैं, यह किसी को नहीं पता। भाजपा के ही अनेक तेजतर्रार नेता सिर्फ अपने विधानसभा क्षेत्रों व अपने समर्थकों तक ही सीमित हैं। इससे साफ दिखता है कि भाजपा की सरकार तो है, लेकिन धरातल पर उसकी बात शायद ही हो रही हो।

अगला सवाल क्या त्रिंवेद्र में यह कूबत है कि वह 2022 में भाजपा को विजयी बनवा दें? इस सवाल का जवाब जानने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि भाजपा को पिछला चुनाव किसने जितवाया। त्रिवेंद्र सिंह रावत, अजय भट्‌ट, रमेश पोखरियाल निशंक या भगत सिंह कोश्यारी ने? आप इनमें से किसी भी नाम पर सहमत नहीं होंगे। अब अगर उत्तराखंड भाजपा के किसी भी नेता ने चुनाव नहीं जितवाया तो निश्चित ही इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को जाएगा। ठीक ऐसी ही स्थिति हरियाणा में मनोहर लाल के साथ थी और मनोहर के नेतृत्व में पिछले साल हुए विधान सभा चुनावों में पार्टी बहुमत से पांच सीटें पीछे रह गई, जबकि छह महीने पहले ही लोकसभा में भाजपा क्लीन स्वीप कर चुकी थी। वहां भी 2014 का चुनाव मोदी ने ही जितवाया था। हरियाणा में तो कांग्रेस नेतृत्व द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा को चुनाव की कमान सौंपने में देरी की वजह से मनोहर की लाज बच गई थी। बस इसी आधार पर हम उक्त सवाल का जवाब खुद ही पा सकते हैं।

क्या डबल इंजन (मोदी व रावत) की सरकार विकास के मोर्चे पर कामयाब रही? इसका सबसे आसान जवाब आपको अपने आसपास ही मिल जाएगा। जरा घर से बाहर निकलें और चार पांच किलोमीटर घूम कर आएं तो आपको लगेगा कि शहर में कहीं भी तो कुछ बदला नहीं है। वहीं टूटी गड्‌ढेदार सड़कें, वही भ्रष्टाचार, सरकार में सभी जगहों पर बाहरी लोगों की तैनाती खनन से लेकर सभी बड़े कामों में बाहरी लोगों का बोलबाला। कुल मिलाकर जिंदगी कहीं से भी आसान नहीं हुई। स्मार्ट सिटी के नाम पर बस राजपुर रोड के अलावा बाकी देहरादून तो किसी को भी नजर नहीं आता। पूरे शहर में इस सड़क के अलावा शायद ही कहीं पर फुटपाथ हो। आपको रेलवे स्टेशन, आईएसबीटी या फिर एयरपोर्ट ही क्यों न जाना हो सड़कों की हालत बहुत ही खराब है। अब दावा किया जा सकता है कि ऑल वेदर रोड़ बन रही है, लेकिन सिर्फ उसकी वजह से हर बार तो भाजपा को वोट नहीं दिया जा सकता और यह राजमार्ग बना मोदी सरकार रही है तो उनकी बारी आएगी तो जनता देख लेगी। क्रमश:

ऐसे ही कई सवालों के जवाब एडीटर्स व्यू शनिवार को भी तलाशेगा।

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