जिन्हें सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम मजबूत करना था उन्होंने ही कमजोर किया अब फल तो भुगतना ही होगा

संजीव पांडेय

देश का संपन्न और मजबूत तबका कोरोना का शिकार होने लगा है। ये तबका वही है, जिनकी जिम्मेवारी देश में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना था। देश के गृहमंत्री कोरोना संक्रमित हो गए हैं। तमिलनाडु के गर्वनर बनवारी लाल पुरोहित भी संक्रमित हो गए हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान व कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदीयुरप्पा भी संक्रमित हो गए हैं। कोरोना ने कांग्रेस के नेताओं समेत कई दलों के नेताओं को शिकार बनाया है। बंगाल, तामिलनाडु और बिहार के एक-एक विधायक कोरोना के कारण मौत के शिकार बन गए। उतर प्रदेश में आदित्यनाथ सरकार की मंत्री कोरोना के कारण मौत की शिकार हो गई। बिहार में सीपीआई के प्रदेश सचिव और पूर्व विधायक सत्यनाराय़ण सिंह की मौत कोरोना से हो गई। बिहार में तो कोरोना से कई डॉक्टरों की मौत हो गई। देश भर में कई डॉक्टर कोरोना के शिकार हो गए है। हालांकि बिहार में इसी साल चुनाव होने है। गठबंधन सरकार कोरोना से निपटने के बजाए वर्चुअल रैली में व्यस्त है। उधर राजस्थान में सरकार कोरोना से निपटने के बजाए सरकार के बचाव में व्यस्त है। कई राज्यों में नौकरशाही भी कोरोना का शिकार हुई है। संक्रमण उनमें भी फैला है। अब गरीब के साथ-साथ समाज का अमीर, मजबूत तबका भी कोरोना का शिकार हो रहा है, इसलिए देश भर बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर चर्चा जमकर हो रही है। अमीरों का इलाज करने वाले देश के बड़े प्राइवेट अस्पताल भी कोरोना काल में अमीरों की भीड़ की समस्या से जूझ रहे हैं, इसलिए देशभर के बड़े संपन्न तबकों के लिए सहारा देश भर के मजबूत पब्लिक सेक्टर के अस्पताल हैं। खबर आई कि अमित शाह मेदांता अस्पताल में भर्ती है। लेकिन उन्हें देखने के लिए एम्स की टीम भी वहां गई। यह उन नेताओं के लिए खासा सबक है जिन्होंने सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं को बदहाल किया। उनकी जगह निजीकरण को बढ़ावा दिया। इस देश की नौकरशाही और नेताओं ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों के विकास में अपना खासा योगदान दिया है। लेकिन अब देश के संपन्न तबकों को निजी अस्पताल कोरोना से इलाज नहीं दे पा रहे हैं। उन्हें सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर और स्टाफ का अनुभव पर खासा भरोसा है। बिहार में तो ज्यादातर संपन्न तबका पटना के सरकारी एम्स में बेड लेने के लिए बड़ी बड़ी सिफारिशें लगवा रहा है। देश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों का हाल जो है, वो सारा देश जानता है। इसका एक उदाहरण बिहार है जहां आजादी के बाद गया, भागलपुर, बेतिया, मुजफ्फऱपुर आदि शहरों में कई मेडिकल कॉलेजों बनाए गए। लेकिन आज ये मेडिकल कॉलेज तबाही के कागार पर है। बाकी राज्यों की हालात भी लगभग यही है। हुक्मरानों ने अपने निजी स्वार्थ में पब्लिक सेक्टर के मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।    

देश की तकदीर देखिए। जनता कोरोना से त्राहि-त्राहि कर रही है। जनता पर  कोरोना और बेरोजगार दोनों की मार पड़ी है। लेकिन उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा है। बिहार में सारे राजनीतिक दल चुनावी तैयारी में लग गए थे। पर अब जब कोरोना ने बड़े लोगों को शिकार बनाया तो घबराहट फैल गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने स्वास्थ्य विभाग के दो प्रिंसिपल सेक्रटी बदल दिए गए। उधर बाकी राज्यों में जब बड़े नेताओं और अधिकारियों को कोरोना ने शिकार बनाया तो हड़कंप मच गया। दरअसल नेताओं को तो अपनी जान की परवाह है। लेकिन उन्हें अपने कार्यकर्ताओं की जान की परवाह नहीं है। बिहार में बड़े नेता वर्चुअल चुनावी रैली में व्यस्त हो गए। लेकिन नीचले कार्यकर्ताओं को जनता के बीच चुनाव प्रचार के लिए भेजना शुरू कर दिया। इससे कई दलों के कार्यकर्ता कोरोना संक्रमित हो गए। बिहार में प्रदेश भाजपा कार्यालय में राज्य भर के भाजपा नेताओं की बैठक बुला ली गई थी। बैठक का परिणाम यह निकला कि अच्छी संख्या में भाजपा नेता कोरोना पॉजेटिव हो गए। बैठक से भाग लेकर जिलों में वापस गए कई भाजपा नेता कोरोना पॉजेटिव हो गए। उन्हें खासी परेशानियों का सामना करना पड़ा। सता में भागीदार होने के कारण राजधानी पटना में बैठे भाजपा के बड़े नेताओं का कोरोना टेस्ट तो आसानी से हो गया। लेकिन जिले स्तर पर कार्यकर्ताओं को कोरोना टेस्ट करवाने में खासी परेशानी का सामना करना पड़ा।

कोरोना देश में आपदा मे अवसर लेकर आया है। फार्मा कंपनियों के मजे लगे है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों की सलाह पर देश भर में उन दवाइयो का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनका इस्तेमाल कोरोना में ट्रायल के आधार पर ही हो रहा है। ये कोरोना को कितना ठीक कर रहा है इसकी जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं है। लेकिन वैज्ञानिको और डॉक्टरों से संक्रमिक मरीजों के इलाज के अनुभव के आधार पर फार्मा कंपनियो ने जमकर कमाई की। दुनिया भर के वैज्ञानिक और डॉक्टर इस खेल में बेनकाब हो रहे है। एक तरफ अरबों डालर की कमाई फर्मा कंपनियां ने की है। भारत में 15 लाख से ज्यादा कोरोना संक्रमित हो गए है। यहां भी फार्मा कंपनियों को आपदा में अवसर मिला है। इबोला बीमारी में फेल हो चुका वैक्सीन रेमडेसिविर का इस्तेमाल कोरोना में हो रहा है। उचित दाम के कई गुणा ज्यादा पचास हजार से एक लाख के बीच इस वैक्सीन का ब्लैक हो रहा है। हालांकि जिन लोगों को ये वैक्सीन लगाया गया है, उन्हें कोई बहुत लाभ नहीं मिला। बहुत सारे कोरोना संक्रमित वैक्सीन लगवाने के बाद भी मौत के मुंह में चले गए। कई और दवाइयों का कारोबार कोरोना काल में बढ़ा। विज्ञान के क्षेत्र के लोगों का कहना है कि फर्मा कंपनियों के लिए यह आपदा में अवसर इसलिए है कि कोरोना काल में हिट एंड ट्रायल कई दवाइयों का हो रहा है। जो लोग बच रहे है वो दवाइयों के कारण नहीं बच रहे है। जो लोग कोरोना संक्रमण के बाद भी अगर बच रहे है तो इसमें कुछ सबसे ब़ड़ा कारण उनका मजबूत इम्यून सिस्टम है। इसके बावजूद हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, फेवीपिरावीर, रीटोनावीर समेत कई और दवाइयो का इस्तेमाल मरीजों पर किया जा रहा है। इन दवाइयों का इस्तेमाल कई और बीमारियों के इलाजे में किया जाता है। लेकिन चुकिं एक ही साथ दुनिया भर में अगर कोरोड़ों लोग एक बीमारी से बीमार हो जाए तो कई दवाइयों के लिए बिजनेस के अवसर उपलब्ध हो जाते है।

दुनिया भर के साइंस जर्नल में वैज्ञानिक और डॉक्टर अलग-अलग लेख लिखकर फार्मा कंपनियों का धंधा बढ़ा रहे है। कुछ फर्जी स्टडी भी छापी गई। बाद में स्टडी छापने वाले जर्नल ने माफी भी मांगी। दिलचस्प बात है कि कभी डॉक्टर और वैज्ञानिक कुछ बोलते है कभी कुछ बोलते है। इससे दुनिया भर में भय का वातावरण बनाया गया है। ताकि लोग कोरोना के भय से भयभीत रहे। वैक्सीन आने तक भय बना रहे, ताकि लोग खुद वैक्सीन लगाने के लिए आगे आए। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी फार्मा कंपनियों के खेल में शामिल नजर आ रहा है। और तो और खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ही विश्व स्वास्थ्य संगठन पर सवाल खड़े कर दिए है।

भारत में उदारीकरण के पैरोकारों को सोचना होगा कि क्या स्वास्थ्य में निजीकरण महामारी को रोक सकता है? कोरोना ने यह बता दिया निजी क्षेत्र महामारी को रोक नहीं सकता। क्योंकि यह मुनाफे का खेल देखता है। निजी क्षेत्र सेवा के लिए बाजार में नहीं आता। जबकि महामारी में सेवा जरूरी है। भारत में चुकिं एक अरब से ज्यादा आबादी है इसलिए पब्लिक सेक्टर को अब और मजबूत करना जरूरी है। देश भर में संक्रामक रोग अस्पतालों का जाल फैलाना होगा। ब्रिटिश राज के समय में बनाए गए संक्रामक रोग अस्पतालों को 1990 के बाद निजीकरण के पैरोकारों ने खंडहर बना दिया। संक्रामक रोग अस्पतालों के जमीन पर बिल्डरों ने कब्जा कर लिया। सरकारी मेडिकल कॉलेज में संक्रामक रोग विशेषज्ञों को सिर्फ एक कमरा दे दिया गया। आज जब महामारी फैली है तो संक्रामक रोग अस्पतालों और इसके विशेषज्ञ डाक्टरों की खोज रही है।

नेता और अफसर जो कोरोना संक्रमित है वो बेहतर इलाज चाहते है। उनहें बेहतर इलाज मिल भी जाएगा। उन्हें देश भर के बड़े  विशेषज्ञ इलाज दे देंगे। लेकिन सवाल यह है कि कोरोना ने यह तो इन नेताओं और अफसरों को बता दिया है कि हेल्थ सेक्टर में जिस मॉडल पर उनकी नीतियां है, वो देश को तबाह कर देगी। फिर महामारी आएगी तो सिर्फ गरीब जनता ही नहीं मरेगी। मरेंगे देश के बड़े नेता और अफसर भी। वैसे में स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई प्रभावी नीतियों को अपनाने की जरूरत है। स्वास्थ्य के क्षेत्र को नौकरशाही के नियंत्रण से निकालना होगा। आईएएस अधिकारी स्वास्थ्य क्षेत्र को नियंत्रित करते है। इस समय देश में भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर भारतीय स्वास्थ्य सेवा की जरूरत है। 

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