Sunday, November 29, 2020

राहुल नहीं बल्कि वसुंधरा के कौशल ने बचाई है गहलोत सरकार

विद्रोह से पहले भाजपा की आंतरिक स्थिति का सही आकलन नहीं कर सके सचिन पायलट, मोदी-शाह के लिए भी है यह झटका

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राजस्थान का राजनीतिक संकट खत्म होने के संकेत है। दिलचस्प राजनीतिक नजारा है। भतीजे ने जहां मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरवाकर भाजपा की सरकार बनवा दी, वहीं बुआ ने राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बचा दी। राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार को राहत मिलती नजर आ रही है। सचिन पायलट ने राहुल गांधी से मुलाकात के बाद कांग्रेस के साथ चलने के संकेत दिए हैं। हालांकि, यह कहना जल्दीबाजी होगा कि राजस्थान का राजनीतिक संकट खत्म हो गया है? पायलट और राहुल की मुलाकात के बाद यह अंदाजा लगाना कठिन है कि राजस्थान में भविष्य में राजनीतिक संकट नहीं आएगा? दरअसल सचिन पायलट गलत मौके पर परिस्थितियों का आकलन किए बिना विद्रोह कर गए। उनके विद्रोह ने उनकी राजनीतिक स्थिति खासी कमजोर कर दी है। पायलट राजस्थान कांग्रेस की आंतरिक स्थिति को सही तरीके से भांप नहीं पाए। लेकिन उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल यह थी कि वे राजस्थान भाजपा की आंतरिक राजनीति नहीं समझ पाए। सचिन पायलट को लगा कि भाजपा के अंदर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को चुनौती देने वाला कोई नहीं है। वे वसुंधरा राजे की ताकत का आकलन नहीं कर सके। वैसे सचिन पायलट ही नहीं, कई राजनीतिक समीक्षक भी वसुंधरा के खेल से हैरान है। वसुंधरा राजे ने जिस तरह से अप्रत्यक्ष तरीके से गहलौत सरकार की मदद की, उससे यह पता चला कि उन्हें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की परवाह बिल्कुल नहीं है। वसुंधरा ने यह संकेत दिए कि वे केंद्रीय नेतृत्व से एकदम नहीं डरती है। इधर राहुल गांधी कोई यह गलतफहमी ने पाले कि उन्होंने सचिन पायलट को मना लिया। दरअसल सचिन पायलट ने भी कांग्रेस में वापसी का रास्ता तब ढूंढा जब उन्हें साफ पता चल गया कि केंद्र की भाजपा सरकार के सरकार गिराने के खेल को वसुंधरा ने मात दे दी है। पायलट को जब यह लगा कि भाजपा अब राजस्थान में गहलौत सरकार गिराने की स्थिति में नहीं है, तो कांग्रेस में वापसी का रास्ता तय किया। क्योंकि पायलट के पास कांग्रेस में वापसी के अलावा कोई चारा नहीं रहा है। इसलिए अगर राजनीतिक समीक्षक पायलट की बगावत खत्म करने में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के राजनीतिक कौशल की भूमिका समझ रहे तो यह उनकी भारी गलतफहमी है।  संजीव पांडेय

राजस्थान के राजनीतिक संकट के कई राजनीतिक अर्थ है। मोदी काल में सिर्फ कांग्रेस विधायक ही टूटेंगे, भाजपा विधायक नहीं टूट सकते है, यह मिथक राजस्थान में टूटता नजर आया है। जिस तरह से कुछ भाजपा विधायकों को टूट की डर से गुजरात शिफ्ट किया गया, उससे यही संकेत मिले कि भाजपा विधायक मोदी काल में भी टूट सकते है। वसुंधरा के खेमे के भाजपा विधायकों ने साफ संकेत दिए कि उनके लिए भाजपा से ज्यादा महत्वपूर्ण वसुंधरा राजे सिंधिया है। यही नहीं भाजपा के केंद्रीय नेतत्व के खास गजेंद्र सिंह शेखावत की महत्वकांक्षाओं को फिलहाल वसुंधरा ने पटखनी दे दी है। शेखावत कांग्रेस की सरकार गिरने की स्थिति में भाजपा के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार होते। गजेंद्र सिंह शेखावत के जितने बड़े राजनीतिक दुश्मन अशोक गहलौत है, उतनी ही वसुंधरा राजे है। अशोक गहलौत के गृह जिले जोधपुर से ही शेखावत संबंध रखते है। शेखावत ने गहलौत के बेटे को 2019 के लोकसभा चुनावों में हराया था। उधऱ वसुंधरा किसी भी कीमत पर शेखावत को मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं देखना चाहती है।

राजस्थान के राजनीतिक संकट ने नरेंद्र मोदी सरकार की साख को बहुत ही नीचे गिराया है। जिस तरह से केंद्र सरकार की शह पर एक के बाद एक राज्यों की सरकारें गिरायी जा रही है, उससे लोकतंत्र बेमानी हो गया है। दलबदल विरोधी विधेयक का कोई मतलब नहीं रह गया है। चुनी हुई सरकारों को गिराने के लिए संविधान, विचारधारा सबको ताक पर रखा जा रहा है। धन, बल और कानूनी शक्तियों का जमकर दुरूपयोग हुआ है। सत्ता में हिस्सेदारी और सत्ता पर कब्जे के लिए भाजपा सारे सिदांतों की तिलांजली दे रही है। सिदांतों और संविधान को तिलांजली देकर बिहार में भाजपा सत्ता में भागीदार बन गई। मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिरा दी गई। कर्नाटक में कुमार स्वामी को सता से बाहर किया गया। अब भाजपा के निशाने पर राजस्थान और महाराष्ट्र है। दरअसल भाजपा राज्यों में विरोधी दलों की सरकारों को बरदाश्त ही नहीं कर पा रही है। भाजपा संघीय ढांचे को खत्म करने पर तुली हुई है। भाजपा विरोधी दलों के अस्तित्व को किसी भी तरह से खत्म करना चाह रही है। भाजपा के प्रकोप से वही राज्य बचे हुए है, जहां भाजपा का जनाधार बिल्कुल नहीं है। चाहे वो केरल हो या आंध्र प्रदेश। तामिलनाडू हो या तेलंगाना।

कांग्रेस में संकट तो पहले से ही है। कांग्रेस में पुराने नेताओं और युवाओं के बीच राजनीतिक संघर्ष की खबरें आ रही है। मध्य प्रदेश औऱ राजस्थान का राजनीतिक संकट भी कांग्रेस के अंदर सता की मलाई खाने के संघर्ष का परिणाम है। सच्चाई यह है कि कांग्रेस संगठन में शीर्ष पर बैठे बुजूर्ग नेताओं का कोई जनाधार नहीं है। लेकिन दूसरी सच्चाई यह भी है कि राहुल गांधी के साथ लगी हुई युवा टोली भी कांग्रेस के अंदर जनाधार से हीन है। राहुल की युवा टोली कांग्रेस में कारपोरेट के प्रतिनिधि है। उनका जनता के दुख-दर्द से कोई लेना देना नहीं है। वे कारपोरेट हितों को बचाने के लिए कांग्रेस के अंदर मौजूद है। ये युवा टोली कांग्रेस के बड़े नेताओं के ही पुत्र है। चाहे वो सचिन पायलट हो या जतिन प्रसाद। कांग्रेस छोड़ भाजपा में गए ज्योतिरादित्य सिंधिया भी कांग्रेस नेता पुत्र है। मिलिंद देवड़ा भी कांग्रेस के अंदर कारपोरेट हितों को संरक्षक रहे स्वर्गीय मुरली देवड़ा के बेटे है।

नरेंद्र मोदी सरकार कांग्रेस की राजनीति को भलिभांति जानती है। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार को यह समझना होगा कि जिस संकट से इस समय कांग्रेस निकल रही है, उसी संकट से जल्द ही भाजपा गुजरेगी। क्योंकि भाजपा का संवाद जनता से अब खत्म हो रहा है। भाजपा पूरी तरह से कारपोरेट प्रतिनिधि बन चुकी है। हिंदुत्व और राम मंदिर की आड़ में भाजपा कारपोरेट हितों को जिस तरह से साध रही है, वो जनता को समझ में आ रहा है। कोरोना के कारण आए आर्थिक संकट की आड में जिस जिस तरह से सरकारी संपतियों को बेचा जा रहा है, उसे जनता समझ रही है। कोरोना आपदा के समय में मोदी सरकार राजस्थान सरकार को गिराने में तो व्यस्त रही। उधर कोरोना से जूझ रही जनता से केंद्र सरकार और भाजपा सांसद-विधायकों का संपर्क पूर तरह से टूट गया है। बिहार में बाढ़ पीड़ितों ने भाजपा सांसद जनार्दन सिंह सिग्रिवाल से जो व्यवहार किया है, उससे केंद्र सरकार को जनता के बीच बढ़ रहे गुस्सा का अंदाजा हो जाना चाहिए।

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