Tuesday, March 9, 2021

व्यंग्य : कोरोना का नेता प्रेम और नेताओं के मेदांता प्रेम के बीच गरीब का खस्ताहाल सरकारी अस्पताल

Must read

दो नेताओं के बीच घूमती बिहार की दलित राजनीति

संजीव पांडेय बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने खेमा बदल लिया है। इस साल प्रस्तावित बिहार...

अयोध्या जा रहे कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू को बाराबंकी में हिरासत में लिया

बाराबंकी। अयोध्या में किसानों से मिलने जा रहे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को बाराबंकी में हिरासत में ले...

त्रिवेंद्र की कोशिश पर पार्टी ने फेरा पानी

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की अनिच्छा के बावजूद भाजपा संगठन ने जिस तरह से रुड़की के विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन...

कांग्रेस के असंतुष्टों की मंशा पर उठते सवालों के जवाब भी जरूरी हैं

बगावती तेवर में सता की लालसा है। सत्ता का वियोग है। जिन्हे निशाने पर लिया गया है वे भी लोकतांत्रिक नहीं हैं। जनता...

चंडीगढ़। कोरोना का नेता प्रेम लगातार बढ़ने से यह तो साफ हो ही गया है कि अब कोरोना को बांधना आसान नहीं है। हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल से लेकर विधानसभा अध्यक्ष ज्ञान चंद गुप्ता तक कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। बाकी मंत्रियों, विधायकों और अफसरों की तो अब गिनती भी नहीं हो रही है। कोरोना के वीवीआईपी में प्रसार से देश के पांच सितारा अस्पतालों की मौज आ गई है। हर बड़ा नेता अब गुड़गांव के मेदांता अस्पताल की दौड़ लगा रहा है। यह वही अस्पताल है, जिसकी फाइल हरियाणा सरकार ने खोली हुई है। क्योंकि अस्पताल ने गरीबों के लिए किए गए वादे को पूरा नहीं किया था। अब गरीबों की कोई बड़ा अस्पताल क्यों सोचेगा? बेचारे वीवीआईपी गरीबों की खातिर इतना बलिदान कर रहे हैं कि उन्होंने तमाम सरकारी अस्पतालों को गरीबों के लिए समर्पित कर दिया है। अब भी गरीब अगर बड़े और अच्छे अस्पताल में भर्ती होने का सपना देखता है तो यह उसकी मूर्खता ही कही जाएगी। सरकारी अस्पतालों में क्या नहीं है? वह हर अव्यवस्था है, जिसका गरीब आदी है। लंबी लाइन से लेकर गंदगी और झिड़कने वाले स्टाफ से लेकर समय पर अस्पताल न आने वाले डॉक्टर सब कुछ है। इलाज का इंतजार ही कई बार इतना लंबा हो जाता है कि मरीज को आखिर में इसकी जरूरत ही नहीं रहती।

अगर नेता सचमुच में गरीबों की सोचते तो वे शायद इन्हीं सरकारी अस्पतालों में भर्ती होते। इससे एक तो इन अस्पतालों को हर समय सतर्क रहना पड़ता और दूसरे वीवीआईपी नेताओं को अपने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत भी पता चलती। लेकिन, नेता तो नेता है। उसे पब्लिक की याद तो पांच साल बाद ही आती है और पब्लिक भी ऐसी है कि वह हाथ जोड़े नेताजी के उसके प्रति किए गए महान बलिदान को ही भूल जाती है। जब तक पब्लिक नेताओं से सवाल नहीं पूछेगी और उससे हर काम का हिसाब नहीं मांगेगी तक तक नेता जनता को मूर्ख बनाने के लिए ऐसे बलिदान करते ही रहेंगे।

- Advertisement -

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -

Latest article

टिकैत के आंसू क्या राजनीति का टर्निंग प्वाइंट है?

नई दिल्ली। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत के आंसू आज बहस का विषय बन गए हैं। टिकैत रोए क्यों?...

नवम सतत् पर्वतीय विकास शिखर सम्मेलन का उद्घाटन

देहरादून। सतत् पर्वतीय विकास शिखर सम्मेलन के वर्चुचल उद्घाटन सत्र में शुक्रवार को  उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत मुख्य अतिथि एवं...

समीक्षा के बहाने ‘अपने मन की’ करने की तैयारी में त्रिवेंद्र

खराब प्रदर्शन के आधार पर नापसंद मंत्रियों को हटाएंगे और अपनी पसंद के नेताओं को सरकार में लाएंगे

पहले दौर में हुड्‌डा का दांव योगेश्वर दत्त पर भारी

चंडीगढ़। विधानसभा चुनाव के ठीक एक साल बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्‌टर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा आमने-सामने हैं। बरोदा...

हरियाणा की बेटी ने फतह की उत्तराखंड की सबसे ख़तरनाक चोटी रुदुगैरा

विश्व विख्यात पर्वतारोही अनीता कुंडू ने उत्तराखंड में स्थित रुदुगैरा को फतह कर लिया। उनका ये अभियान प्रधानमंत्री और खेल मंत्री...