Saturday, October 31, 2020

कांग्रेस के असंतुष्टों की मंशा पर उठते सवालों के जवाब भी जरूरी हैं

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कांग्रेस के असंतुष्टों की मंशा पर उठते सवालों के जवाब भी जरूरी हैं

बगावती तेवर में सता की लालसा है। सत्ता का वियोग है। जिन्हे निशाने पर लिया गया है वे भी लोकतांत्रिक नहीं हैं। जनता...

बगावती तेवर में सता की लालसा है। सत्ता का वियोग है। जिन्हे निशाने पर लिया गया है वे भी लोकतांत्रिक नहीं हैं। जनता के हमदर्द नहीं हैं। यह भी गलतफहमी न पालें कि जिन्होंने हाईकमान को निशाने पर लिया है, वे लोकतंत्र के हमदर्द है। ये ड्रामा सता सुख से वंचित होने के कारण हो रहा है। वैसे तो फिलहाल कांग्रेस का संकट टल गया है। पार्टी मे उपर से नीचे तक परिवर्तन की मांग करने वाले 23 नेताओं और कांग्रेस हाईकमान के बीच फिलहाल संधि हो गई है। खबर है कि सोनिया गांधी छह महीने और अंतरिम अध्यक्ष रहेंगी। उम्मीद की जा रही है कि ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की जल्द ही बैठक बुलाई जाएगी। लेकिन, 23 नेताओं की चिट्ठी ने एक बार फिर यह बता दिया है कि कांग्रेस अपने बुरे दौर से भी सीखने को तैयार नहीं है। कांग्रेस भाजपा की कार्यशैली से कुछ सीखने को तैयार नहीं है। वहीं सोनिया पर सवाल उठाने वाले नेताओं पर भी तमाम सवाल उठने वाजिब हैं। क्योंकि सच्चाई तो यही है कि चिट्ठी में निशाने पर आने वाले और चिट्ठी लिखने वालों की प्राथमिकता सत्ता की मलाई है। संजीव पांडेय 

पार्टी की खराब होती हालात को लेकर पत्र लिखने वाले 23 नेताओं को 2014 में पार्टी की बुरी हार के 6 साल बाद कांग्रेस पार्टी कमजोर नजर आ रही है। जबकि 2014 में कांग्रेस ने आजाद भारत में हुए लोकसभा चुनावों में सबसे खराब प्रदर्शन किया था। आखिर 2014 में हार के लिए जिम्मेवार कौन थे? इसकी समीक्षा 6 सालों तक क्यों नहीं हुई। असंतुष्ट 23 नेता भी छह सालों तक चुप क्यों रहे? छह सालों तक इनकी चुप्पी के क्या कारण थे। ये असंतुष्ट सत्ता की मलाई चखना चाहते थे। इन्हें उम्मीद थी कि 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार की विदाई हो जाएगी। जीएसटी, नोटबंदी जैसे मसलों के काऱण मोदी सरकार को जनता विदा कर देगी। कांग्रेस फिर से दिल्ली की सत्ता में आएगी औऱ सत्ता की मलाई फिर से खाने को मिलेगी। असंतुष्ट होकर चिट्ठी लिखने वालों मे कई यूपीए सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे है। पार्टी में ये वरिष्ठ है।  2019 में अगर पार्टी सत्ता में आती तो वरिष्ठता के आधार पर फिर से महत्वपूर्ण मंत्रालयों में होते। 2014 में ही बुरी हार के बाद पार्टी की हालत काफी खराब हो गई थी। इन नेताओं को इस सच्चाई की जानकारी थी। लेकिन, कभी भी इन नेताओं हार को लेकर मंथन करने की बात नहीं की। इन्होंने कांग्रेस अधिवेशन बुलाने की मांग नही की। क्योंकि इन्हें पता था कि अगर 2019 से पहले वे पार्टी के संगठन को मजबूत करने और पार्टी में लोकतंत्र की बहाली की मांग करते तो पार्टी से बाहर होते। जिन नेताओं ने पार्टी के कामकाज पर असंतोष प्रकट किया है वे लंबे समय से कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र के दमन के गवाह भी रहे औऱ समर्थक भी रहे है। ज्यादातर असंतुष्ट पार्टी में हाईकमान के यस मैन रहे हैं। चिट्ठी लिखने वाले ज्यादातर असंतुष्ट कांग्रेस पार्टी में कारपोरेट घरानों के हितों के संरक्षक भी रहे है।

यूपीए के दस साल के कार्यकाल में कई जनविरोधी कार्यों को अंजाम दिया गया। 23 असंतुष्ठ नेताओं में से कई यूपीए सरकार में मंत्री थे। लेकिन जब ये मंत्री थे तो उन्हें न तो पार्टी संगठन की चिंता थी न पार्टी के अंदर आंतरिक लोकतंत्र की चिंता थी। इन्हें कांग्रेस पार्टी के निचले कार्यकर्ताओं की भी चिंता नहीं थी। अगर ये पार्टी में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते थे तो मंत्री रहते सवाल उठाते। असंतुष्ट नेताओं को खुद ही संगठन की मजबूती औऱ आंतरिक लोकतंत्र में विश्वास नहीं है, वैसे में वे सता की मलाई कैसे छोड़ते। अगर वर्तमान असंतुष्टों को पार्टी में लोकतंत्र, कांग्रेस संगठन औऱ देश की जनता की बहुत चिंता थी तो खुद को विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह पेश करते। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी की कार्यशैली पर सवाल उठाय़ा था। सरकार में भ्रष्टाचार पर सवाल उठाया था। यूपीए सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के कई मामले आए। लेकिन वर्तमान असंतुष्ट जिनमें कई मंत्री यूपीए में थे एक बाऱ भी भ्रष्टाचार पर कोई बात नहीं की।

1984 में भारी बहुमत से आए राजीव गांधी को मुद्दों के आधार पर उनके ही सरकार में वित्त और रक्षा मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने घेर लिया था। वीपी सिंह राजीव गांधी के सामने नहीं झुके। रक्षा सौदों में दलाली और कुछ कारपोरेट घरानों के हितों की रक्षा दोनों के बीच विवाद का कारण बन गया। वीपी सिंह पार्टी से बाहर हो गए। उन्होंने राजीव गांधी को 1989 में सत्ता से बेदखल कर दिया। लेकिन ये 23 असंतुष्ट चिट्ठी तब लिख रहे है, जब कांग्रेस की हालत काफी खराब है। आजादी के बाद के सबसे बुरे दौर से कांग्रेस गुजर रही है। वीपी सिंह ने तो राजीव गांधी के खिलाफ  विद्रोह उस वक्त किया था, जब आजादी के बाद कांग्रेस सबसे मजबूत स्थिति में थी।

असंतुष्टों को कांग्रेस के इतिहास में घटी कुछ घटनाओं से सीख लेना चाहिए। कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की बलि बहुत पहले ही चढ़ गई थी। 1980 के बाद कांग्रेस हाईकमान कल्चर और बादशाही आदेशों से चलती रही है। जो सत्ता में सर्वोच्च होता है, उसका चारण बनकर ही कोई नेता कांग्रेस में मजा ले सकता है। याद कीजिए नरसिंह राव को। तिरुपति में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था। यहां कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लिए चुनाव हुआ। अर्जुन सिंह और शरद पवार जैसे नेता भारी वोटों से वर्किंग कमेटी में जीत कर आए। नरसिंह राव इन नेताओं की पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र में इतनी भारी जीत से परेशान हो गए। उन्होंने बहाना बनाया कि वर्किंग कमेटी में महिलाओं और दलितों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, इसलिए चुने हुए तमाम सदस्य इस्तीफा दे। सारे चुने हुए सदस्यों ने इस्तीफा दिया। बाद में सारे सदस्यों को नरसिंह राव ने मनोनित किया।  

शरद पवार मराठा क्षत्रप थे। स्वतंत्र भारत में दिल्ली में पेशवाई हुकूमत कायम करने की इच्छा मराठा नेताओं की हमेशा रही। लेकिन राजीव गांधी की मौत के बाद शरद पवार मौका चूक गए थे। उधऱ अर्जुन सिंह पार्टी में गांधी परिवार के लॉयल थे। नरसिंह राव वर्किंग कमेटी में इनकी जीत को बरदाश्त नहीं कर सके थे। दरअसल कांग्रेस में लोकतंत्र और संगठन की मजबूती के नाम पर हाईकमान कल्चर को पूरी तरह से स्थापित किया गया। सोनिया गाँधी ने जब पार्टी की कमान सम्हाली तो नरसिंह राव के कार्यकाल में उनके सामने नतमस्तक होने वाले कांग्रेसी सोनिया गांधी के दरबार में नतमस्तक हो गए। शरद पवार जैसे लोगों ने सोनिया गांधी के नेतृत्व पर अंगुली उठायी तो पार्टी से बाहर हो गए।

कांग्रेस पार्टी गांधी परिवार की जेब की पार्टी है, यह एक सच्चाई  है। बेशक कांग्रेस के लोग कांग्रेस की समृद्ध विरासत की बात करते है, लेकिन यह सिर्फ भाषणों तक सीमित है। कांग्रेसी नेताओं को पता है कि महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, मौलाना आजाद, सुभाषचंद्र बोस के समय की कांग्रेस पार्टी और वर्तमान कांग्रेस पार्टी में जमीन-आसमान का अंतर है। 1980 के बाद जिन नेताओं से गांधी-नेहरू परिवार को भय हुआ, उन्हें पार्टी में हाशिए पर लाया गया। कुछ सालों के लिए गांधी परिवार के अंदाज में ही नरसिंह राव ने गांधी परिवार को पार्टी में हाशिए पर रखा। प्रणव मुखर्जी के कद से सोनिया गांधी को हमेशा भय रहा। प्रणव मुखर्जी पर लगाम कसे रखने के लिए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया। मनमोहन सिंह नेता नहीं थे, रिमोट से चलने के लिए तैयार हो गए। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में खूब मजे से कांग्रेस पार्टी ने 10 साल राज किया। सोनिया गांधी ने जो  सता और संगठन मे चाहा, वही कुछ हुआ। जिन 23 नेताओं ने फिलहाल पार्टी में उपर से नीचे तक परिवर्तन की मांग की है, उसमें से कई यूपीए सरकार में मंत्री रहे है। ये उस समय गर्व से कहते थे, ‘ये सोनिया जी का आदेश है’। यूपीए सरकार में मंत्रियों को नियंत्रित करने के लिए एक मंत्री से दूसरे मंत्री पर निगरानी भी करते थे। प्रणव मुखर्जी की निगरानी पी. चिंदबरम करते थे। दिलचस्प बात यह थी कि न तो पी चिंदबरम का कोई जनाधार है, न प्रणव मुखर्जी का कोई जनाधार रहा। दोनों नेताओं ने अपने गृह राज्यों में कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया। ये दोनों नेता हाईकमान कल्चर के साथ थे। पी चिंदबरम के गृह राज्य तामिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से हाशिए पर है। फिर भी चिदंबरम सोनिया गांधी की खास पसंद रहे। चिदंबरम यूपीए सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों को देखते रहे। प्रणव मुखर्जी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए कुछ नहीं कर पाए। जंगीपुर लोकसभा में उन्हें ममता बनर्जी मदद करती रही।

पश्चिम बंगाल में जनाधार रखने वाली ममता बनर्जी कांग्रेस पार्टी छोड़कर चली गई। वे बंगाल में कांग्रेस को हाशिए पर डाल खुद मुख्यमंत्री भी बन गई। आज आंध्र प्रदेश में कांग्रेस हाशिए पर है। क्योंकि जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस से बाहर हो गए। आज जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस को आंध्र प्रदेश में हाशिए पर  ला दिया है। वे खुद मुख्यमंत्री पद पर विराजमान है। असंतुष्ट 23 नेताओं ने कभी भी ममता बनर्जी, शरद पवार और जगन मोहन रेड्डी को कांग्रेस पार्टी में वापसी की मांग नहीं की ? आखिर क्यों? अगर ये तीन नेता कांग्रेस में वापस आते है तो तीन बड़े राज्यों में कांग्रेस का संगठन फिर से मजबूत हो जाएगा। तीनों राज्यों में कांग्रेस सत्ता पर काबिज हो सकती है। लेकिन इनकी वापसी की बात कर कोई नेता सोनिया गांधी को नाराज नहीं करना चाहता। इसमें वर्तमान असंतुष्ट नेता भी शामिल है।

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