Tuesday, November 24, 2020

बिहार में परंपरागत वोटों के खिसकने से डरा एनडीए डैमेज कंट्रोल में जुटा

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बिहार में कोरोना के कारण विधानसभा चुनाव समय पर होंगे या टलेंगे, फिलहाल इस पर असमंजस है। लेकिन सताधारी गठबंधन को अपने परंपरागत वोटरों के खिसकने का डर सता रहा है। भाजपा को चिंता अपने शहरी मतदाताओं और ग्रामीण इलाकों में अगड़ी जाति के मतदाताओं को लेकर है। वहीं नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) की चिंता कुशवाहा जाति को लेकर बढ़ी है। कुशवाहा जाति बिहार में नीतीश कुमार को खुलकर समर्थन करती रही है। कोरोना संकट के दौरान भाजपा औऱ जद यू के परंपरागत समर्थक वोटरों का मोहभंग होने के संकेत मिल रहे है। जद यू समर्थक कुशवाहा मतदाता किन कारणों से सताधाऱी गठबंधन से नाराज हो रहे, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। बिहार के औरंगाबाद जिले में औरंगाबाद-डाल्टेनगंज रोड पर स्ट्राबेरी की खेती के लिए मशहूर आदर्श गांव चिल्हकी बिगहा है। कुशवाहा जाति बहुल यह गांव स्ट्राबेरी की खेती के कारण ही संपन्न हो गया है। गांव में ज्यादातर जद यू समर्थक है। कुछ साल पहले तक इस गांव के युवा हरियाणा के पानीपत और सोनीपत जिलों में स्थित स्ट्राबेरी फार्मों में बतौर श्रमिक काम करते थे। उन्होंने यहां फार्म में काम करते हुए स्ट्राबेरी की खेती का तरीका सीख लिया। यहां श्रमिक का काम करने वाले ज्यादातर युवा अपने गांव लौट गए। वे अपने ही गांव में थोड़ी बहुत मौजूद जमीन में स्ट्राबेरी की खेती करने लगे। क्योंकि गांव की जमीन स्ट्राबेरी की खेती के लिए उपयुक्त है। लेकिन, मार्च महीने में एकाएक किए गए लॉकडाउन ने गांव के लोगों का भारी नुकसान किया। लॉकडाउन के कारण कोलकता, रांची, औरंगाबाद, डाल्टेनगंज, पटना के बाजारों तक जाने वाली स्ट्राबेरी खेत में ही सड़ गई। स्ट्राबेरी की खेती कर रहे किसानों को 50 हजार से लेकर 2.50 लाख रुपए तक का नुकसान हुआ।संजीव पांडेय

दरअसल बिहार में कुशवाहा जाति के लोग ही सबसे ज्यादा सब्जी उत्पादन करते है। सब्जी उत्पादन का इनका तरीका काफी पेशेवर होता है। पिछले तीस सालों में  कुशवाहा जाति ने बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अपनी अच्छी जगह बनाई है। कोविड-19 के लॉकडाउन ने इनके कृषि उत्पाद, जिसमें सब्जी ही ज्यादा है, का खासा नुकसान हुआ है। महीनों चले लॉकडाउन ने ज्यादातर सब्जी खेतों में खराब हो गई। बिहार के कई शहरों में सब्जी की आपूर्ति ग्रामीण इलाकों में मौजूद कुशवाहा जाति के लोग करते है। बिहार में कुशवाहा जाति अपने स्वजातीय उपेंद्र कुशवाहा से ज्यादा कुर्मी जाति से संबंधित नीतीश कुमार को अभी तक पसंद  करते  रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार के सख्त लॉकडाउन का खामियाजा आने वाले विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार को भुगतना पड़ सकता है।

बीते दिनों कुछ शहरी इलाकों में भी भाजपा से संबंधित विधायकों को जनता का विरोध का सामना करना पड़ा है। पटना शहर के एक भाजपा विधायक का विरोध उनके ही विधानसभा क्षेत्र में लोगों ने किया। इसका वीडियो भी खूब वायरल हुआ। स्थानीय शहरी लोगों ने विधायक का विरोध शहरी बदहाली के कारण किया। टूटी सड़क और पानी के जमाव से लोग नाराज थे। वैसे बिहार के तमाम शहर गंदगी के लिए ही जाने जाते है। लेकिन कोरोना के दौरान तो बिहार की शहरी आबादी को पिछले 15 सालों के  विकास की कई सच्चाइयों से रूबरू होना पड़ा। ज्यादातर जनप्रतिनिधि कोरोना काल में  गायब थे। क्योंकि विधायकों को खुद कोरोना का डर सता रहा था। पटना जैसे शहर में कोरोना से निपटने में स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से फेल हो गई। जिनकी सिफारिश थी उन्हें तो सरकारी अस्पतालों में बेड मिल गया। बाकी साधारण लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। बिहार के शहरी इलाकों में भाजपा का वर्चस्व है। शहरी इलाकों में भाजपा का वर्चस्व होने के कुछ कारण है। शहरों में परंपरागत रुप से भाजपा समर्थक बनिया, कायस्थ, भूमिहार, राजपूत, ब्राहमणों का वर्चस्व है। लालू यादव के राज में शहरी इलाके के लोग लॉ एंड आर्डर की समस्या से खासे प्रभावित हुए थे। इसलिए इनके पास कांग्रेस के पराभव के बाद भाजपा ही विकल्प रही। हालांकि नीतीश कुमार के 15 साल के राज में बिहार में शहरी विकास का हाल बुरा है। बीते साल पटना में आयी बाढ ने बिहार के शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर की पोल खोल दी थी। विकास का ढोल पीटने वाले राज्य के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी बाढ़ से बचने के लिए पटना के एक पुल पर खड़े नजर आए। वहीं बिहार के पटना, गया, मुजफ्फपुर, भागलपुर आदि शहरो को गंदगी की राजधानी आप कह सकते है। दूसरे शहरों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। हालांकि तमाम गंदगी और विकास से दूर रहने के बावजूद शहरी सीटों पर भाजपा मजबूत रही है, क्योंकि लोगों को लालू यादव का जंगलराज अक्सर चुनावों में याद दिलाया जाता है।

लालू यादव के जंगलराज बिहार की शहरी आबादी के बीच भाजपा का ट्रंप कार्ड है। शहर में  कुछ काम न करो। बस चुनाव के वक्त जंगलराज की याद दिला दो। दरअसल शहरों में राजद विरोधी मतदाताओं का जमावड़ा है। वैश्य, कायस्थ समेत शहरों में भूमिहार, राजपूत आदि मतदाताओं की गोलबंदी शहरों में भाजपा को मजबूत करती है। लालू यादव के भय ने बिहार में शहरी मतदाताओं को एनडीए की तरह पूरी तरह से जोड़ कर रखा है। गंदगी से लबलबाते बिहार के तमाम शहर भाजपा के गढ़ है। अगर गंदगी में गोल्ड मेडल देने की बात आएगी तो बिहार के शहर अव्वल आएंगे। लेकिन इस बार परिस्थिति बदली है। कोरोना के लॉकडाउन का असर बिहार के शहरों पर दिख रहा है। एक तो बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था ने शहरी आबादी को कोरोना काल में खफा कर दिया है। वहीं कोरोना के लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित भाजपा का परंपरागत वैश्य मतदाता हुआ है। शहरी वैश्य मतदाताओं पर पहले नोटबंदी और जीएसटी की भी मार पड़ी थी। इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी का राष्ट्रवादी मोड ने वैश्य मतदाताओं को भाजपा के साथ पूरी तरह से जोड़े रखा।  भाजपा को इस बात का भय है कि विधानसभा चुनाव में शहरी आबादी भाजपा से दूर हो सकती है। लॉकडाउन ने शहरी आबादी की रोजी-रोटी को खासा प्रभावित किया है। वैश्व समुदाय का व्यापार चौपट हो गया है। ये परंपरागत तौर पर भाजपा वोट के साथ-साथ चंदा भी देते रहे है।   

भाजपा की जिम्मेवारी तय है। भाजपा को विधानसभा चुनाव में अगड़ी जातियों को गठबंधन के पक्ष में एकजुट रखने की जिम्मेवारी है। लेकिन जमीन पर हालात कुछ बदले हुए है। राजपूत मतदाता खुलकर भाजपा के साथ है। लेकिन बाकी अगड़ी जातियों में इस बार महागठबंधन सेंध लगा सकता है। राजद का आक्रमक तरीके से विरोध करने वाली भूमिहार जाति इस बार उदासीन है। भूमिहारों मेंं सेंध भी  लग सकता है। राजद ने भूमिहार एडी सिंह को राज्यसभा में भेज भूमिहारों को मैसेज दिया है कि राजद इस बार के चुनाव में अपने पुराने सामाजिक और जातीए समीकरण में  बदलाव करेगा। महागठबंधन में भूमिहारों को भी टिकट देने पर विचार हो रहा है। लालू यादव का दल भी कुछ भूमिहारों को चुनाव मैदान में उतार सकता है। दरअसल भाजपा में  भूमिहार पूरी तरह से हाशिए पर आ गए है। किसी जमाने में बिहार भाजपा में भूमिहारों का वर्चस्व होता  था। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका स्वर्गीय कैलाशपति मिश्र की थी। लेकिन अब भूमिहार भाजपा में संगठन में हाशिए पर है। लोकसभा में भाजपा की तरफ से एक भूमिहार सांसद गिरिराज सिंह है। भूमिहारों की नाराजगी दूर करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने मनोज सिन्हा को जम्मू-कश्मीर का लेफ्टिनेंट गर्वनर बनाया है।

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