Tuesday, November 24, 2020
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पिथौरागढ़ में बादल फटने से तीन की मौत, भूस्खलन में दो गांव दबने से 11 लापता

पिथौरागढ़। रविवार देर रात से हो रही भारी बारिश से पिथौरागढ़ के मुन्स्यारी और बंगापानी तहसीलों में व्यापक तबाही हुई है। मुख्यमंत्री ने जिला प्रशासन को राहत कार्यों में किसी तरह की कोताही न बरतने के निर्देश दिए हैं। भूस्खलन की वजह से घरों के गिरने से तीन लोगों की मौत हो गई और पांच लोग घायल हो गए। वहीं दो गांवों के मलबे में दबने से 11 लोग लापता हैं। राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) की दो टीमें मौके पर हैं, लेकिन जिला प्रशासन ने एक और टीम की मांग की है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तत्काल ही तीसरी टीम भेजने के निर्देश दिए हैं। पुलिस भी मौके पर राहत कार्यों में मदद कर रही है। सोमवार तड़के करीब तीन बजे गैला गांव में वर्षा से दो घर गिर गए, जिससे शेरसिंह, गोविंदी देवी और मानता की मौत हो गई, जबकि दीदार सिंह, रुक्मणी देवी, प्रियंका, शीला और मनकू घायल हो गए। वहीं तांगा मुन्यानी में दो गांव भूस्खलन में दब गए, जिसमें 11 लोग लापता हैं। उनकी तलाश की जा रही है, लेकिन बारिश इसमें बाधा डाल रही है। रविवार की रात मुन्स्यारी में 84 मिलीमीटर व धारचूला में 149 मिलीमीटर बारिश हुई है। रास्ता खराब होने से इन गांवों तक पहुंचने में भी दिक्कत हो रही है।

समीक्षा के बहाने ‘अपने मन की’ करने की तैयारी में त्रिवेंद्र

खराब प्रदर्शन के आधार पर नापसंद मंत्रियों को हटाएंगे और अपनी पसंद के नेताओं को सरकार में लाएंगे

प्रमुख संवाददाता

देहरादून। उत्तराखंड सरकार के मंत्रियों के कामकाज की मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत समीक्षा करने जा रहे हैं। कॉरपोरेट की तर्ज पर सभी मंत्रियों से पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन बनाने के लिए भी कहा गया है। इसके लिए विभागवार शेड्यूल भी जारी हो गया है। मुख्यमंत्री का यह आदेश जारी होते ही राज्य सरकार के महकमों में हड़कंप मच गया है। क्योंकि इस समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ऐसे मंत्रियों को जमकर लताड़ लगाने वाले है, जिन्हें वह मंत्रिमंडल के चुनाव से पूर्व संभावित विस्तार से पहले हटाना चाहते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रदेश सरकार में अभी तीन मंत्रियों की जगह खाली है और इसे भरने के लिए लंबे समय से विस्तार की अटकलें लग रही है। अब विधानसभा चुनाव के लिए लगभग एक साल बाकी रह गया है, ऐसे में मुख्यमंत्री खुलकर खेलना चाहते हैं। सरकार गठन के समय मंत्रिमंडल बनाते समय कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं को भी एडजस्ट करना पड़ा था और उस समय त्रिवेंद्र सिंह मुख्यमंत्री पद के लिए अपेक्षाकृत जूनियर थे। लेकिन अब करीब चार साल शासन के बाद अब मुख्यमंत्री को अपनी ताकत का अहसास हो गया है और केंद्र का वरदहस्त होने से उन्हें लगने लगा है कि आगामी चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा, इसालिए वह चाहते हैं कि अब सब कुछ उनकी ही मर्जी का हो। इसीलिए छोटी-छोटी बातों का श्रेय लेने से भी मुख्यमंत्री गुरेज नहीं कर रहे हैं और अब वह मंत्रिमंडल में ऐसे साथियों को चाहते हैं, जिन्हें वह अपनी मर्जी से हांक सकें। अभी तक वह जूनियर होने की वजह से वरिष्ठ मंत्रियों को कुछ कह नहीं पाते हैं और जिसे वह कुछ कहते हैं, वह पीछे हटकर चुप बैठ जाता है। इसी वजह से उत्तराखंड में ऐसा लग रहा है मानों एक उपमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक त्रिवेंद्र ही हैं। मदन कौशिक और सतपाल महाराज को छोड़ दें तो किसी भी मंत्री की मौजूदगी का अहसास भी नहीं होता है।

अभी उत्तराखंड भाजपा के वरिष्ठतम मंत्रियों में शुमार हरक सिंह रावत के त्रिवेंद्र ने जिस तरह से पर कतरे हैं, उससे यह भी साफ हो गया है कि उन्हें ऊपर से भी खुलकर खेलने की छूट मिल गई है। मुख्यमंत्री के वार के बावजूद हरक सिंह अभी आह भी नहीं कर पाए हैं, लेकिन उन्होंने 2022 में चुनाव न लड़ने की बात कहकर पूरी भाजपा को चौंका दिया है। ऊपरी तौर हालांकि सबकुछ सामान्य नजर आ रहा है, लेकिन हरक के अगले दांव को लेकर त्रिवेंद्र सिंह चौकन्ने हो गए हैं। समीक्षा बैठक के बहाने वह कुछ मंत्रियों को यह अहसास कराएंगे कि उन पर कार्रवाई की वजह उनकी खराब परफॉर्मेंस है, कोई पूर्वाग्रह नहीं। लेकिन राजनीति में जो भी होता है, उसकी वजह उससे कहीं अलग होती है, जो दिखता है। यह बात अगर त्रिवेंद्र पर लागू होती है तो यही हरक पर भी लागू होगी। इसीलिए उनके चुनाव लड़ने से यह कतई न मानें कि वे चुनावी राजनीति से दूर हो रहे हैं। लेकिन, इतना तय है कि उत्तराखंड में चुनावी वर्ष हंगामेदार होने वाला है। बस दिवाली का इंतजार कीजिए, राजनीति की आतिशबाजी में बारूद भरा जा चुका है, चिंगारी दिखाते ही चमक-दमक और धूम-धड़ाका भी होना तय है।  

पहले दौर में हुड्‌डा का दांव योगेश्वर दत्त पर भारी

चंडीगढ़। विधानसभा चुनाव के ठीक एक साल बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्‌टर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा आमने-सामने हैं। बरोदा में भाजपा से भले ही योगेश्वर दत्त और कांग्रेस से इंदुराज नरवाल मैदान में हों, लेकिन प्रतिष्ठा खट्‌टर और हुड्‌डा की दांव पर है। यही नहीं यह चुनाव जजपा की जाट वोटों पर पकड़ को भी साबित करने जा रहा है। चुनाव से पहले ही सोमवार को हुड्‌डा ने डॉ. कपूर नरवाल और जोगिन्द्र मोर का पर्चा वापस करवाकर मनोहर लाल को तगड़ा झटका दे दिया है। कपूर नरवाल ने पंचायती उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरा था और उनका पर्चा वापस लेना भी एक तरह से पंचायती फैसला है। विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा व जजपा में भीतरी तौर पर जिस तरह से असंतुष्ट मुखर हुए हैं, उससे सत्ताधारी गठबंधन की राह फिलहाल तो कठिन नजर आ रही है। विधानसभा चुनाव में भले ही हुड्‌डा कांग्रेस को जिता नहीं सके, लेकिन उन्होंने दिखा दिया कि हरियाणा में कांग्रेस का मतलब हुड्‌डा है।

इंदुराज नरवाल को टिकट दिलाने में उनकी ही प्रमुख भूमिका रही। पिछले कुछ समय से कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सैलजा की सक्रियता जरूर बढ़ी है, लेकिन यह सभी जानते हैं कि वह व्यापक जनाधार वाली नेता नहीं हैं और उनका प्रभाव कुछ ही पॉकेट तक सिमटा हुआ है। अब जिस तरह से हुड्‌डा ने बरोदा में किलेबंदी की है, उसने यह भी दिखा दिया है कि हरियाणा के चाणक्य भी वही हैं। पिछला चुनाव हारने के बाद योगेश्वर को दोबारा मौका देकर भाजपा ने इस चुनाव को जाट व गैर-जाट की लड़ाई में बदलने की कोशिश की थी। उसे लग रहा था कि कई जाट प्रत्याशी होने से योगेश्वर की राह आसान हो जाएगी, लेकिन हुड्‌डा के दांव में योगेश्वर की हार एक बार फिर तय कर दी है।

अगर पिछले साल के परिणामों पर नजर डालें तो कांग्रेस के श्रीकृष्ण हुड्‌डा को 42566 व योगेश्वर दत्त को 37726 वोट मिले थे। उस समय का माहौल देखें तो भाजपा को स्पष्ट बढ़त दिख रही थी। वहीं योगेश्वर का स्टारडम भी भाजपा के पक्ष में था। लेकिन, बरोदा के मतदाताओं ने श्रीकृष्ण हुड्‌डा में विश्वास जताया। इस चुनाव में जेजेपी के जाट उम्मीदवार भूपेंद्र मलिक ने 32480 वोट लेकर योगेश्वर की राह को आसान बनाने की कोशिश जरूर की थी। इस चुनाव की कुंजी भी इन्हीं 32,480 वोटों में छिपी है।  इस बार जेजेपी भाजपा के साथ है। पिछले चुनाव में वह भाजपा का विरोध कर रही थी और इसी वजह से उसे जाटों ने भाजपा के विरोध में समर्थन किया था। लेकिन इस बार जेजेपी का भाजपा के लिए वोट मांगना जाट मतदाताओं को रास आएगा यह कहना कठिन है। इसीलिए, अगर योगेश्वर फिर हार जाते हैं तो यह जेजेपी के लिए भी खतरे की घंटी होगी। क्योंकि इससे साफ हो जाएगा कि जेजेपी जाट वोट भाजपा को ट्रांसफर नहीं करा सकती और खुद जेजेपी के लिए भी यह उसके कोर वोट बैंक के खिसकने का अलार्म होगा। वहीं बरोदा की जीत हुड्डा का कांग्रेस और प्रदेश की राजनीति में कद ऊंचा कर देगी। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री मनोहर लाल के लिए भी प्रदेश में आगे की राह कठिन हो जाएगी।     

हरियाणा की बेटी ने फतह की उत्तराखंड की सबसे ख़तरनाक चोटी रुदुगैरा

विश्व विख्यात पर्वतारोही अनीता कुंडू ने उत्तराखंड में स्थित रुदुगैरा को फतह कर लिया। उनका ये अभियान प्रधानमंत्री और खेल मंत्री जी द्वारा चलाए गए अभियान फिट इंडिया मूवमेंट को बढ़ावा देने के लिए था। उन्होंने अनेक तरह की आपदाओं का सामना किया। विपरीत हालात के बावजूद हौसला बनाए रखा और शिखर को छू लिया। इस अभियान के लिए अनीता 25 सितम्बर को घर से निकली थी, 28 को सुबह 5 बजे गंगोत्री से चढ़ाई शुरू की थी। अनीता इस अभियान के तहत पूरे देश भर से 25 पर्वतारोहियों के एक दल नेतृत्व कर रही थी। अनीता ने सेटेलाइट फोन के माध्यम से बताया की बहुत ख़तरनाक रास्तों से होते हुए उन्होंने छह दिन में इस अभियान को सफल बनाया है। उन्होंने ये भी बताया कि अनेक जगह भयभीत करने वाली थी, पर मैंने अपने कदमों को जमाए रखा और आखिर तीन अक्टूबर को सुबह शिखर में तिरंगा लहराने में कामयाब रही। जब मैं शिखर को छू कर के नीचे आ रही थी तो ऊपर से एक पत्थर घूमता हुआ आया और मेरे पांव से लगता हुआ नीचे गया। शुक्र है परमात्मा का जो मैं बाल- बाल बच गई। माउंटेन में हर कदम पर इस तरह की अनेकों ख़तरनाक हालात बनती रहती है। जैसा कि आप सभी को ज्ञात है कि अनिता हाल ही में राष्ट्रपति के हाथों एडवेंचर के सबसे बड़े अवॉर्ड तेनज़िंग नोर्गे से भी सम्मानित हुई है। रुदुगैरा की ऊंचाई 5800 मीटर ऊंची है। परन्तु ये एक टेक्निकल माउंटेन है। इसकी अपनी भौगोलिक परिस्थितियां है।

अनिताकुण्डूकी_उपलब्धियां

2009 में पर्वतारोहण के बेसिक, एडवांस के साथ सभी कोर्स पास किए। सतोपंथ, कोकस्टेट आदि हिदुस्तान की अनेकों चोटियों को फ़तेह किया।

18 मई 2013 को नेपाल के रास्ते माउंट एवरेस्ट फ़तेह किया,

2015 में चीन के रास्ते एवेरेस्ट फ़तेह करने का प्रयास, 22500 फ़ीट पे पहुंचने पर भूकम्प ने क़दमो को रोका, इस त्रासदी में अनिता ने अपने अनेकों पर्वतारोही साथी खोए, अभियान कैंसल हुआ।

2017 में फिर चीन के रास्ते से माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई, 60 दिन के कड़े संघर्ष के बाद 21 मई 2017 को एवरेस्ट फ़तेह किया…

नेपाल और चीन दोनों ही रास्तों से माउंट एवरेस्ट को फ़तेह करने वाली हिंदुस्तान की इकलौती बेटी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

2018 में पूरी दुनियां के सातों महाद्वीपों की चढ़ाई शुरू की…एशिया की माउंट एवरेस्ट, अफ्रीका की किलिमंजारो, यूरोप की एलबुर्स, अंटार्कटिका की विनसन मासिफ, दक्षिणी अमेरिका की अकांकागुवा, ऑस्ट्रेलिया की कारस्टेन्स पिरामिड शिखर फ़तेह। उतरी अमेरिका की देनाली के शिखर से 100 मीटर दूर ही बर्फ़ीले तूफान का सामना किया।

27 सितम्बर 2019 को माउंट एवरेस्ट के बराबर की ही ऊंचाई की चोटी माउंट मनासलू को फ़तेह किया।

अनिता कुण्डू के सभी अभियानों पर करोड़ों रुपए खर्च आता है, ये सभी राज्यसभा सांसद आर.के.सिंन्हा की विशाल कम्पनी एस.आई.एस. उठाती है। क्योंकि सिन्हा ने अपनी ने अनिता को अपनी बेटी के रूप में अडॉप्ट किया हुआ है। उन्होंने अनिता को अपनी सभी कम्पनी, स्कूल, सस्थाएं, हिंदुस्थान समाचार समूह आदि का ब्रांड एंबेसडर बनाया हुआ है।

पुरस्कार : भारत सरकार ने हाल ही में अनीता को तेनज़िंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड, हरियाणा सरकार ने नारी शक्ति पुरुस्कार, कल्पना चावला अवार्ड, सर्वोत्तम महिला पुलिस अवॉर्ड से भी अनीता को सम्मानित किया गया है। सैंकड़ो संस्थाए, समूह, संग़ठन अनिता को सम्मानित कर चुके हैं। अनेकों यूनिवर्सिटी, संस्थाओं आदि ने अनिता को अपना ब्रांड एंबेसडर बनाया हुआ है।

एक पर्वतारोही के साथ-साथ अनिता एक मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर भी जानी जाती है। हिंदुस्तान के हर कोने में उनको सुनने के लिए बुलाया जाता है।

अनिता एक साधारण किसान परिवार से सम्बंध रखती है। जब वे मात्र 13 साल की थी तो उनके पिता का देहांत हो गया था, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पढ़ाई और खेल जारी रखा, खेत मे हल चलाना भी सीखा, पशुओं को पालने में भी महारत हांसिल की। अपने सभी छोटे भाई-बहनों को भी पढ़ाया। और आज करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई।

अनिता ने बताया कि मेरी इस कामयाबी में मेरी माँ और मेरे ताऊ का बहुत बड़ा योगदान है। मेरी माँ ने विपरीत परिस्थितियों में भी मुझ पर विश्वास किया, और मेरे ताऊ ने हमेशा पढ़ने और खेलने के लिए प्रोत्साहन दिया।

अनिता ने बताया कि मेरा एक ही सपना है कि हर बेटी पढ़े और खेले, अपने माँ-बाप और देश प्रदेश का नाम रोशन करें। जिस प्रकार अपने हालातों से मैं लड़ी, वे सब भी ऐसे ही बहादुरी से अपने जीवन में आने वाली चुनोतियों का सामना करें। और अपने जीवन मे सफल हो।

हाथरस से निकल सकता है कांग्रेस के लिए लखनऊ का रास्ता

लखनऊ। हाथरस कांड कांग्रेस उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को पुनर्जीवन देने के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है, खासकर सपा और बसपा द्वारा हाल के दिनों में राज्य की योगी सरकार के प्रति दिखाई जा रही ‘सद्भावना’ की वजह कांग्रेस को बढ़त मिल सकती है। हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के प्रति ब्राह्मणों ने खुलकर नाराजगी जाहिर की है। जिस तरह से अब एक दलित बच्ची के साथ हुए दुराचार को लेकर सरकारी मशीनरी ने काम किया है, उससे दलित भी कहीं न कहीं पीड़ा महसूस कर रहे हैं। मुस्लिम कभी भाजपा के साथ थे ही नहीं। ऐसे में अगर कांग्रेस इन तीन वर्गों की आवाज बनती है तो उसको बढ़त मिलना तय है।

लेकिन, कांग्रेस में जिस तरह से अचानक उबाल आता है और वह कुछ ही समय में ठंडा पड़ जाता है, कांग्रेस को इस प्रवृत्ति से उबरना होगा। योगी सरकार की हठधर्मिता और इस मामले को रफा-दफा करने की प्रवृत्ति ने कांग्रेस की राह को आसान कर दिया है। इस मौके को अगर प्रियंका और राहुल एक फुलटाइम राजनेता की तरह लगातार सड़कों पर उठाते हैं तो यह तय है कि राज्य में कांग्रेस की राह बन सकती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू लगातार सक्रियता दिखा रहे हैं, यह राहुल और प्रियंका के लिए अच्छी बात है, क्योंकि कांग्रेस में अधिकांश नेता सड़कों पर उतरने से परहेज करते रहे हैं, जिसके कारण कार्यकर्ता भी घरों से बैठकर ही राजनीति करने लगे थे। कांग्रेस को सबसे अधिक फायदा सपा व बसपा द्वारा पहले जैसी आक्रामकता न दिखाने की वजह से मिल सकता है। दूसरे, मुलायम सिंह यादव के बुजुर्ग होने के बाद अखिलेश तमाम कोशिशों के बावजूद ‘भैयाजी’ ही बने हुए हैं, जबकि जरूरत ‘नेताजी’ की ही है। योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से भाजपा के भीतर भी कम असंतोष नहीं है। यह भी कांग्रेस के काम आ सकता है। जरूरत बस कांग्रेस को सक्रिय करने भर की है। कांग्रेस को संगठन स्तर पर भी जंग लगे नेताओं को दूर करके ऊर्जावान युवाओं को आगे बढ़ाना होगा। गुरुवार को भी राहुल-प्रियंका के साथ ऐसे नेताओं की भरमार थी जो फोटो खिंचवाने के बाद अपनी-अपनी कारों में एसी की ठंडी हवा में बैठ गए थे। आज कांग्रेस को ठंडी हवा नहीं बल्कि डंडे खाने में सक्षम नेताओं व कार्यकर्ताओं की जरूरत है।  

एशियाई लीडरों की तरह ट्रंप भी कर रहे है इनकम टैक्स की चोरी?

संजीव पांडेय

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लैटिन अमेरिकी और एशियाई लीडरों की कतार में शामिल हो रहे हैं। ट्रंप पर अब उनके इन्कम टैक्स जमा करवाए जाने को लेकर संदेह जताया गया है। ट्रंप के इन्कम टैक्स रिटर्न पर सवाल उठाए गए हैं। यही नहीं ट्रंप अपनी आय संबंधित ब्योरा अमेरिकी जनता के सामने रखने से बच रहे हैं। इस बीच, अमेरिकी मीडिया ने ट्रंप के इन्कम टैक्स रिटर्न पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, अमेरिकी कानून अमेरिकी राष्ट्रपति एवं दूसरे नेताओं को इन्कम टैक्स रिटर्न जनता के सामने रखने को बाध्य नहीं करता। क्योंकि, अमेरिका में इन्कम टैक्स संबंधित ब्योरा राइट टू प्राइवेसी में कवर होता है। लेकिन अमेरिकी लीडरों ने  संवैधानिक बाध्यता न होने के बावजूद खुद ही इन्कम टैक्स रिटर्न सार्वजनिक करने की परंपरा शुरू की थी, जिसे वर्तमान में ट्रंप तोड़ रहे है।

डोनाल्ड ट्रंप अरबों डालर के मालिक है। 2016 के चुनावो से पहले उन्होंने अपने आय संबंधित ब्योरे की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि उनके पास 10 अरब डालर की संपति है। ट्रंप रिएल एस्टेट के बड़े कारोबारी है। लेकिन न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट ने ट्रंप की फजीहत कर दी है। न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रंप ने 2016 में 750 डालर फेडरल इन्कम टैक्स भरा। इसके अगले साल राष्ट्रपति रहते हुए ट्रंप ने फिर 750 डालर इन्कम टैक्स भरा। ट्रंप की इन्कम टैक्स रिटर्न के ब्योरे से अमेरिकी जनता हैरान परेशान है। लेकिन इससे भी बडा खुलासा यह है कि अरबों डालर के मालिक ट्रंप ने पिछले 15 सालों के 10 सालों में कोई इन्कम टैक्स ही नहीं दिया। ट्रंप उदारवादी अमेरिकी कानूनों का पूरा लाभ उठा रहे है। अमेरिकी कानून उन्हें इन्कम टैक्स रिटर्न सार्वजनिक करने को बाध्य नहीं करते। लेकिन ट्रंप पर यही सवाल है कि अगर वे पाक-साफ है तो अपने आयकर रिटर्न जनता के सामने क्यों नहीं रखते? ट्रंप अमेरिका के 47 साल पुरानी परंपरा को क्यों खत्म करना चाहते है, जिसमें राष्ट्रपति पद के तमाम उम्मीदवारों अपने आय संबंधी ब्योरा जनता के सामने रखा है। पहली बार 1973 में पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अपना टैक्स रिटर्न  जनता के सामने रखा था। क्योंकि निक्सन के व्यक्तिगत टैक्स को लेकर विवाद हो गया था।

निश्चित तौर पर जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है ट्रंप फंसते जा रहे है। ट्रंप पर जोरदार हमलें हो रहे है। इसका असर ट्रंप पर दिख रहा है। ट्रंप के व्यवहार में बदलाव नजर आ रहा है। उनके चेहरे पर परेशानी सरेआम झलक रही है। कभी कभी ट्रंप तानाशाहों की तरह ब्यान दे रहे है। वे यह भी भूल गए है कि वे विश्व के एक शक्तिशाली लोकतंत्र के राष्ट्रपति है। ट्रंप अब धमकी दे रहे है कि वे चुनाव हार भी गए तो नए राष्ट्रपति को पावर ट्रांसफर आसानी से नहीं करेंगे। चुनावों के दौरान ट्रंप लगातार धमकी दे रहे है। उनके भाषणों में एशियाई लीडरों की झलक दिख रही है। वे धर्म और रेस के नाम पर अमेरिका में विभाजन करने की कोशिश कर रहे है। वे चाहते है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव व्हाइट वर्सेज ब्लैक हो जाए। अमेरिका के गोरे ब्लैक के खिलाफ हो उनके साथ चले। लेकिन ट्रंप की मुश्किल यह है कि कई बड़े रिपब्लिकन नेता और उनके परिवार ट्रंप के खिलाफ है। बड़े रिपब्लिकन लीडर स्वर्गीय जॉन मैक्केन की फैमिली ने ट्रंप का विरोध किया है। वे जो बाइडेन के समर्थन में खड़े हो गए है।    

अगर अमेरिका की तरह ही भारत में भी  सार्वजनिक जीवन जीने वाले नेताओं को इन्कम टैक्स रिटर्न सार्वजनिक करने के नियम से छूट मिल जाए तो भारतीय नेताओं के मजे लग जाएंगे। भारत में 1961 के इलेक्शन रूल्स के तहृत आय के बारे में चुनाव लड रहे उम्मीदवार को जानकारी देनी होती है। भारत में विधानसभा हो या लोकसभा, चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को अपनी संपति एवं आय की पूर्ण जानकारी चुनाव आयोग को देनी होती है। चुनाव लड़ने वाले नेताओं को पांच सालों का इन्कम टैक्स रिटर्न जमा करवाना होता है। हालांकि एशियाई देशों में टैक्स चोरी करने के आरोपी नेताओं की भरमार है। भारत में आयकर विभाग कई नेताओं के खिलाफ आयकर चोरी के आरोपों की जांच कर रहा है। पाकिस्तान मे हर बड़ा नेता आयकर चोरी का आरोपी है। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर आयकर चोरी का आरोप लगा। पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी पर आयकर चोरी का आरोप लगा। वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान और उनके परिवार पर भी आयकर चोरी का आरोप लगा है। हालांकि यह अलग बात है कि पाकिस्तान की सबसे भ्रष्ट मिलिट्री पर अभी तक आयकर चोरी का आरोप  नहीं लगा है। कई अन्य एशियाई देशों के लीडरों पर आय के अधिक संपति अर्जित करना आम बात है।

उत्तराखंड सरकार का जादू : कोरोना के राज्य से पांव उखड़े

देहरादून। अभी न तो कोई वैक्सीन ही आई है और न ही कोरोना की कोई नई दवा। सरकारों ने भी ऐसा कोई काम नहीं किया है जो कोरोना दुम दबाकर भागने लगे। लेकिन,   उत्तराखंड में कोरोना के सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करें तो राज्य से महामारी ने भागना शुरू कर दिया है। एक पखवाड़े पहले कोरोना के नए मरीजों के आने का जो आंकड़ा प्रतिदिन दो हजार से अधिक हो गया था, वह अब सिमटकर इसके एक चौथाई से भी कम रह गया है। इससे भी खास बात यह है कि नए मरीजों की तुलना में ठीक होने वालों की संख्या भी दो गुने से अधिक हो गई है। अब इसे जादू कहें या उत्तराखंड सरकार द्वारा कोरोना पर छपवाए गए विज्ञापनों को असर।

हम इसे जादू ही कहेंगे। क्योंकि, उत्तराखंड में जिस तेजी से आंकड़े घट रहे हैं, वह जादू से कम नहीं है। जरा 28 सितंबर और 29 सितंबर के आंकड़ों पर नजर डालें। 29 को नए मरीज आए 493 और ठीक हो गए 1413 यानी तीन गुना से भी अधिक। 28 को 457 नए मरीजों की तुलना में 1184 ठीक हुए। पिछले एक सप्ताह से यही रफ्तार है कोरोना की। अगर आंकड़े ऐसे ही रहे तो हम जल्द ही मई की स्थिति में पहुंच सकते हैं, जब पूरे राज्य में मरीजों का रोजाना का आंकड़ा इकाई में ही होता था। कोरोना की इस स्थिति को देखकर एक बहुत ही प्रेरक गीत याद आ रहा है, जिसमें बापू के लिए कहा गया है कि- दे दी हमें आजादी, बिना खड्ग बिना ढाल। ऐसे ही उत्तराखंड सरकार ने भी बिना वैक्सीन व दवा के ही कोरोना से आजादी दिलाने की ओर कदम बढ़ा दिया है। कोरोना की इस हालत से ही आपको अंदाजा होने लगा होगा कि राज्य कोई काम न होने के बावजूद विकास पर विकास कैसे हो रहा है। बेरोजगारों की भीड़ के बावजूद रोजगार पर रोजगार मिल रहे हैं। जहां घास व तिनकों (पिरुल) से भी बिजली बन रही हो वहां पावर कट पर पावर कट लग रहे हैं। जान लें कि यह ‘त्रिवेंद्र का जादू है मितवा’। देखते हैं कि 17 महीनों बाद जनता कौन सा जादू दिखाती है।

जयंती पर देहरादून में कार्यकर्ताओं ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को किया स्मरण

देहरादून। भारतीय जनता पार्टी, देहरादून के कार्यकर्ताओं ने महानगर कार्यालय पर आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर उन्हें याद किया। कार्यक्रम  में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटली उद्बोधन को सुनने के पश्चात पूर्व संगठन मंत्री एवं बीस सूत्रीय कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति के उपाध्यक्ष नरेश बंसल ने कार्यकर्ताओं से कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन पर हमारी केंद्र एवं राज्य की सरकारें चल रही है और उन्हें जनता का भरपूर साथ मिल रहा है क्योंकि स्वर्गीय दीनदयाल जी का चिंतन समाज के अंतिम व्यक्ति की चिंता का चिंतन था उनके विचार हम कार्यकर्ताओं के साथ-साथ देशवासियों  के लिए भी सदैव उपयोगी रहेंगे

 महानगर अध्यक्ष सीताराम भट्ट ने कहा कि यह दीनदयाल जी का ही प्रताप है कि उनके उस समय दिए दिशा निर्देशों के कारण आज हमारा संगठन नर सेवा को ही नारायण सेवा मानता है जिसका उदाहरण इस कोरोना काल में स्पष्ट दिखाई दिया हमारा एक-एक कार्यकर्ता सेवा में जुट पड़ा और एक बार तो लगा कि हम राजनीतिक संगठन है या सामाजिक दरअसल हम दोनों हैं हमारे लिए राजनीति समाज के लिए है ना कि समाज राजनीति के लिए। मेयर सुनील उनियाल गामा ने कहां की पंडित जी के विचारों की छाप इस युग पर है जिससे करोड़ों करोड़ों जीवन प्रभावित हैं एवं उनका अनुसरण करते हैं। कार्यक्रम से पूर्व महानगर के अंबेडकर मंडल गांधी पार्क स्थित पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की मूर्ति पर महानगर के कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत के साथ माल्यार्पण किया। इन कार्यक्रमों में विधायक हरबंस कपूर, खजान दास, दर्जा राज्यमंत्री चौधरी अजीत सिंह, रविंद्र कटारिया राजकुमार पुरोहित प्रदेश पदाधिकारी अनिल गोयल, विनय गोयल, महानगर महामंत्री सतेंद्र नेगी, रतन चौहान, मीडिया प्रभारी राजीव उनियाल, विशाल गुप्ता, लच्छू गुप्ता, पवन चौधरी, हरीश कोहली, सुभाष यादव, रविंद्र बाल्मीकि, आनंद प्रकाश नौटियाल, ऋतु मित्रा व बबीता सहोत्रा सहित अनेक भाजपा कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। महानगर संगठन के सभी 913 बूथों पर भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर उन्हें कार्यक्रम कर स्मरण किया गया।

रोचक वीडियो : पेड़ पर चढ़ता है यह मेंढक

अथहर महमूद सिद्दिकी

कालागढ़ में पेड़ पर चढ़ने वाला मेंढक दिखाई दिया। सामान्य रूप से पानी के तालाब एवं दलदली इलाकों में मेंढक पाए जाते हैं। यह मेंढक जल और थल दोनों पर ही निवास करते हैं। कालागढ़ में मेंढक की एक नई प्रजाति दिखाई दी है। पेड़ पौधों पर चढ़ सकता है।इस मेंढक का साक्षात्कार सवेरे सैर पर निकले लोगों से हो गया। एक अजीब से रंग के मेंढक को फुदक कर पेड़ पर चढ़ते देख सभी आश्चर्यचकित थे। लोगों ने मेंढक की तस्वीरें खींची और वीडियो बनाकर वायरल कर दी।कार्बेट टाइगर रिजर्व के उप प्रभागीय वनाधिकारी कुंदन सिंह खाती ने बताया कालागढ़ में इस तरह का जीव दिखाई देना जनता के लिए अवश्य ही एक अद्भुत घटना हो सकती है, वनों में इस प्रकार के अनेक दृश्य अनायास ही देखने को मिल जाते हैं। मेंढक जल व थल में तो रहता ही है परंतु उसकी कुछ प्रजातियां ऐसी भी हैं जो आम आदमी ने देखी सुनी नहीं है। मेंढक पेड़ पर चढ़ते भी हैं और उस पर अपने घोसले भी बनाते हैं। कालागढ़ में यह मेंढक दिखाई देना कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान के रखरखाव एवं संरक्षण की समृद्धि को दर्शाता है। यह जीव ज्यादातर पेड़ों पर रहता है। जनता को इसके संरक्षण में सहयोग करना चाहिए।

बिहार में सताधारी दल के विधायक व मंत्रियों का क्यों हो रहा है विरोध?

संजीव पांडेय

बिहार की जनता का गुस्सा सामने आ रहा है। सताधारी दल के विधायकों औऱ मंत्रियों को जनता की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। पिछले कुछ समय में ही सताधारी दल से संबंधित दो मंत्रियों और तीन विधायकों को जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ा है। जनता का गुस्सा देख विधायक और मंत्री जी के पास वापस जाने के सिवाय कोई चारा नहीं था। बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा किसी भी वक्त हो सकती है। इधर जनता के बढ़ते विरोध से एनडीए गठबंधन में खासी घबराहट है। सत्ताधारी दल के विधायक और मंत्री विकास का गुणगान कर रहे है। लोगों के बीच प्रचार के लिए उतर रहे हैं। लेकिन, जनता जब विकास से संबधित सवाल पूछती है तो विधायक औऱ मंत्री के  पास जवाब नहीं होता है।

बिहार के औरंगाबाद जिले के गोह विधानसभा क्षेत्र के भाजपा विधायक मनोज शर्मा और बिहार  सरकार में भाजपा कोटे के मंत्री प्रेम कुमार का गोह के एक गांव में ग्रामीणों ने जोरदार विरोध किया। मंच पर बैठे विधायक औऱ मंत्री के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। मुख्यमंत्री के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। स्थानीय लोगों का आरोप था कि विधायक पांच साल इलाके में नजर नहीं आए, अब वोट मांगने पहुंच गए है। बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री शैलेश कुमार को उनके विधानसभा क्षेत्र जमालपुर में लोगों ने किया। उन्हें जातिवादी तक लोगों ने कह दिया। मंत्री जी वापस लौट गए। लोगों ने साफ कहा कि मंत्री ने विकास के बजाए सिर्फ जातिवाद किया है। इसलिए वोट नहीं मिलेगा। ग्रामीणों का गुस्सा देखकर मंत्री जी धीरे से चलते बने।

वैशाली के महनार विधान सभा क्षेत्र में तो सताधारी दल के समर्थकों की पिटाई हो गई। महनार के जद यू विधायक उमेश सिंह कुशवाहा वोट मांगने गए थे। लोगों ने पांच साल का हिसाब मांगा। उसके बाद विधायक जी के समर्थकों के साथ स्थानीय लोगों की झड़प हो गई। विधायक जी के समर्थक पिट गए। हाजीपुर से भाजपा विधायक अवधेश सिंह से जब जनता ने हिसाब मांगा तो वे आश्वासन देने लगे। लोगों ने सड़क न बनने के मुद्दे पर उन्हें घेर लिया। अवधेश सिंह विरोध को बढ़ते देख वहां से निकल गए। जहानाबाद जिले के कुर्था विधानसभा के जद यू विधायक सत्यदेव कुशवाहा से जब ग्रामीणों ने विकास को लेकर सख्त सवाल करने शुरू किए तो उनकी आवाज बंद हो गई। वे चुपचाप वहां से निकल गए। ग्रामीणों और विधायक जी की नोकझोक का वीडियो जमकर वायरल हो रहा है। औरंगाबाद के भाजपा सांसद को उनके ही संसदीय क्षेत्र में युवाओं ने रोजगार के मुद्दे पर घेर लिया। मुश्किल से सुरक्षाकर्मियों ने युवाओं को समझाबुझा कर सांसद महोदय को निकाला।

आखिर इस बार बिहार की जनता बदली हुई क्यों दिख रही है ? विकास के मुद्दे पर बिहार की जनता तीखे सवालों से परहेज करती रही है। क्योंकि बिहार में हमेशा चुनावों के दौरान विकास नहीं जाति पर बात होती है। लेकिन इस बार जनता सताधारी दल के विधायकों और मंत्रियों से विकास पर ही सवाल पूछ रही है। सवाल सताधारी दल के प्रतिनिधियों से कर रही है। क्या वाकई में बिहार बदल रहा है ? क्या कोरोना की मार, बढ़ती बेरोजगारी और गरीबी ने जातिवाद के बैरियर को तोड़ दिया है ? यह सच्चाई है कि दूसरे राज्यों में काम कर रहे बिहार में लाखों कामगार केंद्र सरकार दवारा बिना सोचे समझे किए गए लॉकडाउन का शिकार हो गए है। इस लॉकडाउन का खामियाजा अब बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह से भुगत रही है। लाखों लोग बिहार के गांवों में बेरोजगार है। लॉकडाउन के कारण दूसरे राज्यों से रोजी-रोटी छोड़कर वापस लौटे बिहार कामगारों की हालत खराब है।  

कोरोना और लॉकडाउन ने बिहार के विकास की पोल ही खोल दी। आंकड़ों में सरकार बिहार के ग्रोथ की तारीफ करते नहीं थकती थी। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि बिहार में 56 प्रतिशत श्रम खेती में लगा हुआ है। 8 प्रतिशत श्रम उधोग में लगा हुआ है। वहीं बिहार में आज भी लगभग 50 प्रतिशत युवाओं के पास रोजगार नहीं है। 2005 मे नीतीश कुमार ने दावा किया था कि राज्य में इतना विकास किया जाएगा कि राज्य के लोग दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए नहीं जाएंगे। लेकिन 15 सालों के बाद भी हालात नहीं सुधरे है। 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार और उतर प्रदेश से  लगभग 2.9 करोड़ लोग दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए गए। इसके बाद बिहार से दूसरे राज्यों में कामकाज के लिए जाने वालों की संख्या बढ़ी। इसमें वे जातियां ज्यादा थी जिसके विकास का दावा सताधारी दल करता रहा है। दूसरे राज्यों में कामकाजी बिहारियों में ज्यादातर संख्या अनुसूचित जाति, अति पिछड़े और अन्य पिछ़ड़ी जातियों की है। बिहार से दूसरे राज्यों में गए प्रवासियों में 20 प्रतिशत दलित जाति से संबंधित है। 22 प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियों से संबंधित है। जबकि 42 प्रतिशत अति पिछड़ी जातियों से संबंधित है।

अगर एनडीए सरकार मे पिछड़े, अति पिछड़े और दलित  जातियों का विकास हुआ तो ये दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश में क्यों गए? यही नहीं बिहार का विकास का दावा करने वाली सरकार को ये प्रवासी मजदूर बाहर से भी मदद करते रहे। बिहार के विकास में अपना योगदान देते रहे। ज्यादातर प्रवासी बिहारी प्रति माह अपने राज्य में 3 से 4 हजार रूपया अपने घर भेजता है। घर के सदस्य इस पैसे को बाजार में खर्च करता है, इससे राज्य के विकास में गति आती है। एक अनुमान के अनुसार दूसरे राज्यों में कामकाजी बिहारी अपने राज्य में सलाना 30 हजार करोड़ रुपया भेजते है। यही नहीं बिहार के बहुत सारे लोग खाडी के देशों में भी श्रम कर रहे है। बाहरी मुल्कों में काम करने वाले बिहारी सलाना अपने राज्य में लगभग 7 हजार करोड़ रुपये भेज रहे है। लेकिन कोरोना और लॉकडाउन की मार इसपर भी पड़ी है।

उत्तराखंड सरकार का ‘कोरोना भाग’ मंत्र कर रहा कमाल

देहरादून। उत्तराखंड में कोरोना का एक दिनी आंकड़ा अब दो हजार से भी ऊपर निकल गया है। लेकिन, इससे कोई डर नहीं रहा है। जनता तो खैर खुलकर काम करेगी ही, क्योंकि उसकी मजबूरी है। काम करने से उसे कोरोना मार रहा है और काम न करने से भूख। उसके सामने एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई है। लेकिन, उत्तराखंड सरकार और विशेषकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जिस तरह से कोरोना को निपटाने के लिए कमर कसी है, वह ‘काबिले तारीफ’ है। बस मुख्यमंत्री की कोशिशों ने ही जनता का डर खत्म कर दिया है। उन्होंने ‘कोरोना भाग मंत्र’ प्रशासन के अधिकारियों को दे दिया है। इसीलिए वे काम करने की बजाय दिन भर अपने कार्यालयों या घरों पर बैठकर इस मंत्र का जाप कर रहे हैं। राज्य में सफाई भले न हो, लेकिन कोरोना भाग का मंत्रोच्चार जारी है। सड़कों का हाल बुरा है, लेकिन सभी इंजीनियर और अधिकारी जिस तरह से ‘कोरोना भाग मंत्र’ का जाप कर रहे हैं, वह उन सभी कष्टों को खत्म कर रहा है जो खड्‌डों, माफ कीजिए, सड़कों से गुजरने पर हो रहा है। उत्तराखंड जैसे विद्युत सरप्लस स्टेट में बिजली विभाग के अधिकारी भी ‘कोरोना भाग मंत्र’ के जाप में लगे होने की वजह से अनेक बार बिजली का स्विच ऑन करना भूल जाते हैं। जिससे अनेक क्षेत्रों में बिजली नहीं आती है। लोगों के बिजली कनेक्शन के आवेदन महीनों से लटके हैं। ‘कोरोना भाग मंत्र’ का असर इतना है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री के नीली-पीली जैकेट में फोटो शहर में हर कदम पर लगे हुए हैं। मुख्यमंत्री हरेक को हाथ धोने, सामजिक दूरी रखने और मास्क पहनने की सलाह दे रहे हैं। हालांकि अब बच्चा-बच्चा यह बात जानता है, लेकिन ‘कोरोना भाग मंत्र’ की तरह ही मुख्यमंत्री के अन्य मंत्र भी जारी हैं। राज्य सरकार करोड़ों रुपए रोज समाचार पत्रों में विज्ञापन देने पर खर्च कर रही है। कोरोना पीड़ित लाखों लोगों को रोजगार देने के दावे हो रहे हैं। कोरोना ने जिनकी रोटी छीनी उनसे पूछो कि उत्तराखंड आकर उन्हें क्या मिला तो वे ताली बजाते हुए ‘कोरोना भाग मंत्र’ का ही जाप करने लगते हैं। क्योंकि उनके हाथ खाली हैं। कोरोना मंत्र के साथ ही विज्ञापन मंत्र भी जारी है। जब लोगों के पास खाने के लिए रोटी न हो ऐसे समय में सरकार की प्राथमिकता अगर विज्ञापन है तो समझ लीजिए कि आम हालात में क्या होता होगा। जिन विज्ञापनों के भरोसे सरकार जनता को भ्रमित करने की कोशिश कर रही है, वे ही जनता के गुस्से का कारण भी बन रहे हैं, क्योंकि जनता को तो पता ही है न कि उसे क्या मिला। आगे जनता खाली हाथों से ताली बजाएगी या मुट्‌ठी तानेगी यह तो समय ही तय करेगा। फिलहाल ‘कोरोना भाग मंत्र’ का जाप करें और स्वस्थ रहें।